भगवान जगन्‍नाथ की रथ यात्रा कल से, पहले सोने की झाड़ू से रास्‍ता साफ करेंगे राजा गजपति

✍️NNS Desk
भगवान जगन्‍नाथ की रथ यात्रा कल से, पहले सोने की झाड़ू से रास्‍ता साफ करेंगे राजा गजपति

भगवान जगन्‍नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा 3 दिव्‍य रथों में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलने के लिए तैयार हैं. कल 16 जुलाई को यह रथ यात्रा शुरू होने से पहले गजपति महाराज या उनके राजवंश के उत्तराधिकारी झाड़ू लेकर रथ के मार्ग की सफाई करते हैं. ये झाड़ू बहुत ही खास होती है, जिसमें सोने का हत्था लगा होता है. इसी से रथ मार्ग की सफाई की जाती है. इसके बाद वैदिक मंत्रों और जयघोष के बीच रथ यात्रा का शुभारंभ होता है.

पुरी रथ यात्रा आषाढ़ शुक्‍ल द्वितीया तिथि से प्रारंभ होती है, जो कि इस साल 16 जुलाई, गुरूवार को है. भगवान जगन्‍नाथ की सालाना रथ यात्रा साल के सबसे बड़े पर्व में से एक है, जिसमें शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं. साथ ही विदेशों से भी भक्‍तजन आते हैं.

रथ यात्रा में जब लकड़ी से बने 3 दिव्‍य रथों पर सवार होकर भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्‍नाथ निकलते हैं तो पूरा पुरी शहर महाप्रभु जगन्‍नाथ के जयकारों से गूंज उठता है. रथ यात्रा शुरू होने से पहले राजा गजपति सोने की झाड़ू से रथों के आगे का रास्‍ता साफ करते हैं. इस रस्‍म को छेरा पहेरा कहा जाता है. इसके बाद ही रथ यात्रा प्रारंभ होती है.

सोने की झाड़ू का प्रयोग क्यों किया जाता है?

1-जगन्नाथ रथ यात्रा में सोने की झाड़ू से मार्ग की सफाई केवल एक औपचारिक रस्म नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक भावना का प्रतीक मानी जाती है. हिंदू परंपरा में सोने को शुद्धता, पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक माना गया है. इसलिए भगवान के रथ के मार्ग को सोने के हत्थे वाली झाड़ू से साफ करना उनके स्वागत और सम्मान का विशेष तरीका माना जाता है.

2-यह परंपरा यह संदेश भी देती है कि ईश्वर की दृष्टि में हर व्यक्ति समान है. क्या राजा और क्या प्रजा. गजपति महाराज स्वयं झाड़ू लगाकर यह दर्शाते हैं कि ईश्वर के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति में कोई भेद नहीं होता है. यह विनम्रता, सेवा और समर्पण की सर्वोच्च प्रतीक है.

3-धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोना सौभाग्य, समृद्धि और शुभता का भी प्रतीक है. इसलिए इस पवित्र अनुष्ठान को सकारात्मक ऊर्जा और मंगलमय वातावरण का माध्यम माना जाता है. श्रद्धालु ऐसा मानते हैं कि इस परंपरा के दर्शन और सहभागिता से भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है. यह परंपरा कई पीढ़ियों से निरंतर निभाई जा रही है और आज भी रथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है.

…फिर भक्‍त खीचेंगे रथ

सोने की झाड़ू से सफाई के बाद वैदिक मंत्रोच्‍चार और जयघोष के बीच भक्‍त इन तीनों दिव्‍य रथों की रस्सियां खींचना शुरू करेंगे. भगवान जगन्‍नाथ, भगवान बलभद्र और सुभद्रा देवी के रथों को रस्सियों के जरिए खींचकर 3 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है. जहां भगवान जगन्‍नाथ 1 हफ्ते विश्राम करते हैं और फिर वापस अपने मंदिर लौट आते हैं.

सनातन धर्म में मान्‍यता है कि जो व्‍यक्ति इन रथों की रस्सियों को स्‍पर्श भी कर ले तो उसे मोक्ष प्राप्‍त हो जाता है. उसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है. वहीं इस रथ यात्रा के दर्शन करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है. इस साल पुरी की भगवान जगन्‍नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से 24 जुलाई तक है.

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