कानपुर : कार्रवाई के नाम पर “कब्जे” की पटकथा?”एक जमीन… और 40 साल पुरानी फाइलें”

कानपुर : 2025 जाते-जाते देश-दुनिया की राजनीति में बड़े बदलाव दर्ज हुए। कहीं युद्ध रणनीतियों की चर्चा रही, कहीं चुनावी समीकरणों ने करवट बदली, तो कहीं प्रशासनिक फैसलों ने नई बहसें खड़ी कर दीं। मगर यूपी की औद्योगिक नगरी में पूरे साल एक ही अभियान सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा—फर्जी मुकदमों पर शिकंजा और भूमाफिया पर कार्रवाई। शहर में यह “सख्ती” जितनी तेज़ दिखी, उतनी ही तेजी से एक सवाल भी फैलने लगा, क्या यह कार्रवाई सच में अपराधियों के खिलाफ थी… या किसी खास जमीन के लिए रास्ता साफ किया जा रहा था?

सवाल बड़ा- शहर में अचानक क्यों बढ़ गई “साफ-सफाई”?
पिछले एक साल से शहर में लगातार खबरें चलीं, किसी पर गैंगस्टर, किसी पर जमीन कब्जाने का आरोप, किसी पर फर्जी मुकदमे दर्ज कराने का ठप्पा।हर दिन नए नाम, नए मामले, नए खुलासे। लेकिन जब NATION NOW ने परतें खोलनी शुरू कीं, तो कहानी का एक दूसरा चेहरा सामने आया। कार्रवाई का शोर जितना बड़ा था, जमीन उतनी ही “कीमती” थी और यही से कहानी मुड़ती है एक पॉश इलाके के उस पार्क की तरफ, जिसे शहर के लोग “अपना” मानते हैं।
“एक जमीन… और 40 साल पुरानी फाइलें”
यह कोई नई लड़ाई नहीं थी। कागजों की लड़ाई 1984 से शुरू होकर अदालतों की सीढ़ियां चढ़ती रही। कभी आवंटन, कभी रद्दीकरण, कभी फोरम का आदेश, कभी हाई कोर्ट, कभी सुप्रीम कोर्ट…और इसी बीच उस खाली जमीन पर प्रशासन ने एक पब्लिक पार्क बना दिया। फिर उसे नगर निगम द्वारा नोटिफाइड भी कर दिया गया। सब कुछ “सरकारी” दिखता रहा…लेकिन फाइलों में कुछ और ही चल रहा था।
“2025 में अचानक “कब्जा दिलाने” की कोशिश”
सितंबर 2025 में शहर ने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने कई सवाल खड़े कर दिए, भारी पुलिस बल, अधिकारी, प्रशासनिक टीम…और पार्क पर “कब्जा दिलाने” जैसी कार्रवाई सबसे बड़ा सवाल यही था कि जिस दस्तावेज़/रजिस्ट्री पर विवाद चल रहा था, वो उस वक्त बहाल भी नहीं थी, न कोई नया वैध आवंटन हुआ था…
तो फिर कब्जा दिलाने की इतनी हड़बड़ी क्यों? और फिर कहानी में एंट्री होती है “डर” की।
“निशाने पर कौन ?”
लोग दबी जुबान से कह रहे हैं पार्क बचाने की लड़ाई लड़ने वालों के साथ खड़े एक वकील को गिरफ्तार कर लिया जाता है। दूसरी तरफ एक राजनीतिक पदाधिकारी पर भी मुकदमे का दबाव बनने लगता है। लोगों के मन में सवाल उठता है क्या यह कानून का एक्शन है… या विरोध की आवाज़ को दबाने की रणनीति? यहीं से कहानी और गहरी हो जाती है।
“एक लग्जरी कार… और एक संदिग्ध मुलाकात”
कार्रवाई के बीच एक और किस्सा शहर में कानाफूसी बनकर फैलता है, एक चर्चित अधिकारी कथित तौर पर एक बड़े उद्योगपति की लग्जरी कार सेपत्नी के साथ एक विकास प्राधिकरण के कार्यालय तक जाते हैं। अब सवाल सिर्फ कार का नहीं था…सवाल यह था कि अगर अधिकारी के पास खुद वाहन है, तो किसी और की गाड़ी की जरूरत क्यों पड़ी? और वो भी ऐसे समय में जब शहर में जमीन को लेकर तूफान चल रहा हो।सूत्र कह रहे हैं मतलब साफ था कार्रवाई का असली लक्ष्य अपराध नहीं… जमीन थी।
” दो ऑडियो… और सिस्टम की दरारें “
इसी बीच दो ऑडियो सामने आते हैं। एक में एक पुलिस अधिकारी जैसा स्वर यह संकेत देता है कि कमिश्नरेट में सब कुछ वैसा नहीं है जैसा दिखाया जा रहा है दूसरे ऑडियो में बार के एक बड़े पदाधिकारी जैसा स्वर किसी साथी से वसूली जैसी बातचीत करता सुनाई देता है। लेकिन शहर पूछता है अगर वसूली की बात आपके नाम पर हो रही थी, तो उस पर जांच क्यों नहीं? क्यों नहीं कार्रवाई हुई? कहीं इसलिए तो नहीं कि अगर जांच हुई तो कई चेहरे बेनकाब हो जाते?
” असली लड़ाई “कानून” की नहीं… “कंट्रोल” की है? “
इस पूरी कहानी में सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सिर्फ जमीन विवाद नहीं रहा। यह एक नैरेटिव वॉर बन गया, जहां मीडिया को वही दिखाया गया जो दिखाना था और पीछे पर्दे के अंदर एक अलग ही स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी। स्क्रिप्ट जिसमें कार्रवाई का नाम “अभियान” था और लक्ष्य “करोड़ों की जमीन”।
” अब सवाल सरकार से है… “
इस पड़ताल में कई तथ्य, कई संकेत, कई कड़ियां सामने आई हैं। अब उम्मीद है कि शासन स्तर पर इसकी निष्पक्ष जांच हो ताकि तय हो सके कि क्या सच में भूमाफिया पर कार्रवाई हो रही थी? या कार्रवाई की आड़ में “मलाई” काटने की कोशिश चल रही थी? क्योंकि अगर “पार्क” बचाने वालों को ही अपराधी बनाया जाएगा, तो कल शहर में कोई भी अपनी जमीन, अपना हक, अपनी आवाज़ बचाने की हिम्मत नहीं करेगा। –सूत्र
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