शारदीय नवरात्र आज से शुरू, बस इतनी देर है कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त; जानें पूजन-विधि

✍️NNS Desk
शारदीय नवरात्र आज से शुरू, बस इतनी देर है कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त; जानें पूजन-विधि

शारदीय नवरात्र का पर्व आज, 11 अक्टूबर से शुरू हो रहा है. मां दुर्गा की आराधना के इन नौ दिनों में पहले दिन कलश स्थापना के साथ पूजा की शुरुआत होगी. नवरात्र के दौरान महाष्टमी, महानवमी, हवन और कन्या पूजन का विशेष महत्व माना जाता है. इस बार कलश स्थापना के मुहूर्त को लेकर भी श्रद्धालुओं के बीच उत्सुकता है. ऐसे में जानें प्रतिपदा तिथि, घटस्थापना के शुभ मुहूर्त, चित्रा नक्षत्र, वैधृति योग, अष्टमी-नवमी और व्रत पारण से जुड़ी जरूरी जानकारी.

पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर 2026 को रात 9 बजकर 19 मिनट पर शुरू होकर 11 अक्टूबर को रात 9 बजकर 30 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के आधार पर शारदीय नवरात्र की शुरुआत आज, रविवार 11 अक्टूबर से मानी जा रही है.

कलश स्थापना के सभी शुभ मुहूर्त: आज कलश स्थापना के लिए सुबह का समय प्रमुख माना जा रहा है. उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार, घटस्थापना का सामान्य मुहूर्त सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक बताया गया है. वहीं, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक है. हालांकि, अलग-अलग शहरों और पंचांगों में समय का अंतर हो सकता है. इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार ही कलश स्थापना का समय तय करें.

चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का समय: इस बार नवरात्र के पहले दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग भी चर्चा में हैं. पंचांग की एक गणना के अनुसार, चित्रा नक्षत्र 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 42 मिनट से 11 अक्टूबर की रात 10 बजकर 32 मिनट तक रहेगा. वहीं, वैधृति योग 10 अक्टूबर की रात 10 बजकर 2 मिनट से 11 अक्टूबर की रात 9 बजकर 5 मिनट तक रहेगा.

कुछ धार्मिक मान्यताओं में इन स्थितियों के दौरान घटस्थापना के लिए समय चुनते समय सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है. ऐसे में सुबह के निर्धारित मुहूर्त या अभिजीत मुहूर्त के संबंध में स्थानीय विद्वान या पंचांग से पुष्टि करना उचित रहेगा.

राहूकाल कब से कब तक रहेगा? ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 11 अक्टूबर के दिन राहुकाल शाम साढ़े 4 बजे से लेकर शाम 6 तक रहेगा। इस समय कलश स्थापना करने से बचें।

कलश स्थापना की विधि: कलश स्थापना से पहले पूजा स्थल की सफाई करें. इसके बाद चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें. पास में मिट्टी के पात्र में जौ बोएं.

अब कलश में जल भरें और उसमें अक्षत, सुपारी व सिक्का आदि रखें. कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाकर ऊपर नारियल स्थापित करें. इसके बाद दीपक जलाकर गणेश जी और मां दुर्गा की पूजा करें. परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार पूजा की विधि में अंतर हो सकता है.

महाष्टमी और महानवमी कब है? शारदीय नवरात्र में अष्टमी और नवमी की पूजा का विशेष महत्व होता है. इस दौरान श्रद्धालु दुर्गा पूजा, हवन और कन्या पूजन करते हैं. इस साल महाष्टमी 18 अक्टूबर, रविवार और महानवमी 19 अक्टूबर, सोमवार को पड़ रही है. पूजा और कन्या पूजन की तिथि तय करते समय स्थानीय पंचांग का ध्यान रखना चाहिए.

नवरात्र व्रत पारण का समय: नवरात्र में व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार अष्टमी या नवमी को व्रत खोलते हैं. कुछ लोग अष्टमी के दिन कन्या पूजन के बाद पारण करते हैं, जबकि अन्य परिवारों में नवमी की पूजा, हवन और कन्या पूजन के बाद व्रत खोला जाता है.

व्रत पारण का कोई एक समय सभी स्थानों पर लागू नहीं होता. यह तिथि, स्थानीय पंचांग और पूजा की परंपरा पर निर्भर करता है. इसलिए पारण से पहले अपने शहर के पंचांग में अष्टमी-नवमी की तिथि और समय की पुष्टि जरूर करें.

नवरात्र में रखें इन बातों का ध्यान: नवरात्र के दौरान पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखें और अपनी श्रद्धा के अनुसार दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या मां दुर्गा के मंत्रों का पाठ करें. व्रत रखने वाले लोग अपनी सेहत का ध्यान रखते हुए खानपान करें. नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की भक्ति, आस्था और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है.

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