प्रदोष व्रत- मासिक शिवरात्रि आज एकसाथ, महादेव को प्रसन्न करने का उत्तम अवसर; जानें पूजा मुहूर्त व कथा

✍️NNS Desk
प्रदोष व्रत- मासिक शिवरात्रि आज एकसाथ, महादेव को प्रसन्न करने का उत्तम अवसर; जानें पूजा मुहूर्त व कथा

आज 8 अक्‍टूबर गुरुवार को गुरु प्रदोष व्रत और आश्विन महीने की मासिक शिवरात्रि एकसाथ पड़ रही है. यानी कि एक दिन व्रत रखने से दो व्रत का पुण्‍य मिलेगा. शिव पूजा के इस शुभदायी संयोग पर शुभ मुहूर्त में विधिवत पूजा करना और व्रत कथा पढ़ना महादेव की कृपा प्राप्‍त कराएगा. जानिए आज गुरु प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त क्‍या हैं, साथ ही प्रदोष व्रत कथा भी पढ़ें-

प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि पूजा मुहूर्त: प्रोकेरला पंचांग के अनुसार, आश्विन कृष्‍ण त्रयोदशी तिथि 8 अक्‍टूबर 2026 की रात 10:16 बजे तक रहेगी और इसके बाद चतुर्दशी तिथि प्रारंभ होगी. लिहाजा आज शाम को प्रदोष काल में प्रदोष व्रत पूजा की जाएगी. वहीं हर महीने के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली मासिक शिवरात्रि पर शिव-पार्वती जी की पूजा रात में निशिता काल में होती है, उसका मुहूर्त भी 8 अक्‍टूबर की देर रात को ही है.

प्रदोष व्रत मुहूर्त – शाम को प्रदोष काल में 05:59 बजे से रात 08:27 बजे तक
मासिक शिवरात्रि पूजा मुहूर्त- रात को निशिता काल में 11:44 बजे से देर रात 12:33 बजे तक

मासिक शिवरात्रि चार प्रहर पूजा मुहूर्त

प्रथम प्रहर- शाम 5 बजकर 59 मिनट से लेकर रात 9 बजकर 04 मिनट तक
द्वितीय प्रहर- रात -09 बजकर 4 मिनट से लेकर रात 12 बजकर 8 मिनट तक
तृतीय प्रहर- रात 12 बजकर 8 मिनट से लेकर रात 3 बजकर 13 मिनट तक
चौथा प्रहर- 9 अक्तूबर को सुबह 3 बजकर 13 मिनट से लेकर सुबह 6 बजकर 18 मिनट तक

हालांकि अलग-अलग शहरों में पंचांग में पूजा मुहूर्त समय में कुछ अंतर हो सकता है.

मासिक शिवरात्रि व्रत कथा: प्राचीनकाल में एक गरीब पुजारी रहता था. उस पुजारी की मृत्यु हो गई तो उसकी विधवा पत्नी अपने भरण-पोषण के लिए पुत्र को साथ लेकर भीख मांगने लगी. एक बार वह शाम को वापस लौट रही थी, तब उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई, जो कि अपने पिता की मृत्यु के बाद दर-दर भटकने लगा था. उसकी यह हालत पुजारी की पत्नी से देखी नहीं गई, वह उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई और पुत्र जैसा रखने लगी.

एक दिन पुजारी की पत्नी अपने साथ दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम ले गई. वहां उसने ऋषि से शिवजी के प्रदोष व्रत की कथा एवं विधि सुनी तथा घर जाकर अब वह भी प्रदोष व्रत करने लगी.
एक बार दोनों बालक वन में घूम रहे थे. उनमें से पुजारी का बेटा तो घर लौट गया, परंतु राजकुमार वन में ही रह गया. उस राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो उनसे बात करने लगा. उस कन्या का नाम अंशुमती था.

राजकुमार दूसरे दिन फिर से उसी जगह पहुंचा, जहां अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी. तभी अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया तथा उससे कहा कि आप तो विदर्भ नगर के राजकुमार हो ना, आपका नाम धर्मगुप्त है. अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिवजी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते है, क्या आप इस विवाह के लिए तैयार हैं?

राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दे दी तो उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ. बाद में राजकुमार ने गंधर्व की विशाल सेना के साथ विदर्भ पर हमला किया और घमासान युद्ध कर विजय प्राप्त की तथा पत्नी के साथ राज्य करने लगा. वहां उस महल में वह पुजारी की पत्नी और पुत्र को आदर के साथ ले आया तथा साथ रखने लगा. पुजारी की पत्नी तथा पुत्र के सभी दुःख व दरिद्रता दूर हो गई और वे सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगे.

एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे का कारण और रहस्य पूछा, तब राजकुमार ने अंशुमती को अपने जीवन की पूरी बात बताई और साथ ही प्रदोष व्रत का महत्व और व्रत से प्राप्त फल से भी अवगत कराया. उसी दिन से प्रदोष व्रत की प्रतिष्ठा व महत्व बढ़ गया तथा मान्यतानुसार लोग यह व्रत करने लगे. धार्मिक मान्‍यता है कि यह व्रत करने से साधक के सारे कष्‍ट दूर होते हैं. पाप नष्‍ट होते हैं.

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