पुरी, ओडिशा में स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध और पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु का एक स्वरूप माना जाता है। हर साल यहां देश-विदेश से लाखों-करोड़ों श्रद्धालु प्रभु के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पुरी जगन्नाथ मंदिर रहस्य अपनी भव्यता, रथ यात्रा और आध्यात्मिक मान्यताओं के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

पुरी जगन्नाथ मंदिर का धार्मिक महत्व
जगन्नाथ मंदिर को चारधामों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि इसके निर्माण, पूजा पद्धति और संरचना से जुड़े कई रहस्य आज भी लोगों को आकर्षित करते हैं।

जगन्नाथ मंदिर के चार मुख्य द्वार
जगन्नाथ मंदिर में चार प्रमुख द्वार हैं, जो चारों दिशाओं में स्थित हैं और प्रत्येक का अपना अलग आध्यात्मिक महत्व है।
सिंह द्वार (पूर्व):
यह मंदिर का मुख्य द्वार है, जिसका मुख पूर्व दिशा की ओर है। इसी द्वार के सामने अरुण स्तंभ स्थित है। सिंह द्वार को मोक्ष का प्रतीक माना जाता है और अधिकतर श्रद्धालु इसी द्वार से मंदिर में प्रवेश करते हैं।
अश्व द्वार (दक्षिण):
दक्षिण दिशा में स्थित इस द्वार का प्रतीक घोड़ा है। इसे विजय द्वार भी कहा जाता है। मान्यता है कि प्राचीन समय में योद्धा यहां से प्रवेश कर युद्ध में जीत की कामना करते थे। (अन्य द्वारों का भी धार्मिक महत्व बताया जाता है, जो मंदिर की संरचना को पूर्ण बनाते हैं।)
22 सीढ़ियों का आध्यात्मिक रहस्य

पुरी जगन्नाथ मंदिर रहस्य में सबसे रहस्यमयी मानी जाती हैं 22 सीढ़ियां, जिन्हें ‘बैसी पहाचा’ कहा जाता है। मान्यता है कि ये सीढ़ियां मानव जीवन की 22 बुराइयों या कमजोरियों का प्रतीक हैं। इन पर विजय प्राप्त करने के बाद ही व्यक्ति मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।इन सीढ़ियों में तीसरी सीढ़ी को ‘यम शिला’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस सीढ़ी पर पैर रखने से यमलोक के दर्शन होते हैं, इसलिए विशेष रूप से मंदिर से बाहर निकलते समय श्रद्धालु इस पर पैर रखने से बचते हैं। कुछ मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि इस पर पैर रखने से अर्जित पुण्य नष्ट हो सकते हैं।हालांकि वर्तमान समय में मंदिर में केवल 18 सीढ़ियां दिखाई देती हैं, लेकिन परंपरा और मान्यताओं में आज भी 22 सीढ़ियों का उल्लेख मिलता है।
जगन्नाथ मंदिर का प्रारंभिक इतिहास
जगन्नाथ मंदिर का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने करवाया था। मंदिर की एक अनूठी परंपरा यह है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियां हर 12 से 19 वर्षों में बदली जाती हैं, जिसे ‘नवकलेवर’ कहा जाता है।पुरी जगन्नाथ मंदिर रहस्य आज भी श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के लिए आस्था, विज्ञान और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम बने हुए हैं।
