कांग्रेस के नये UP प्रभारी मांग बैठे अखिलेश यादव से आधी विधानसभा सीटें

✍️NNS Desk
कांग्रेस के नये UP प्रभारी मांग बैठे अखिलेश यादव से आधी विधानसभा सीटें

UP में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर INDIA गठबंधन के भीतर अभी से शह और मात का खेल शुरू हो गया है. कांग्रेस के नवनियुक्त उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने जिम्मेदारी संभालते ही समाजवादी पार्टी (सपा) के सामने ‘बराबर-बराबर’ सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग रख दी है. गौतम ने न सिर्फ आधी सीटों पर दावा ठोका, बल्कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की जमकर तारीफ भी की जिसने यूपी की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक गौतम ने साफ-साफ कहा, “व्यक्तिगत रूप से मैं चाहूंगा कि गठबंधन में दोनों पार्टियों की बराबर की हिस्सेदारी हो. हालांकि, जब दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत होगी तब अंतिम फैसला होगा. मुझे पहले से कोई घोषणा करने का अधिकार नहीं है, लेकिन हम निश्चित रूप से आधी सीटों के लिए अपनी बात मजबूती से रखेंगे.”

403 सीटों का गणित: उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं. अगर इतिहास पर नजर डालें तो ठीक 10 साल पहले भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था. उस समय सपा ने 298 और कांग्रेस ने 105 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. हालांकि, कई सीटों पर दोनों के बीच ‘फ्रेंडली फाइट’ भी हुई थी और अंततः बीजेपी की प्रचंड लहर में वह गठबंधन बिखर गया था.

इसके बाद दोनों दल लोकसभा चुनावों में साथ आए, जहां उन्हें बड़ी सफलता मिली. यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से सपा ने 62 पर चुनाव लड़कर 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस ने 17 में से 6 सीटों पर कब्जा जमाया.

दावों और उम्मीदों का टकराव: सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के उत्साह से लबरेज कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में सपा से करीब 150 सीटों की मांग कर सकती है. शुरुआती संकेतों की मानें तो समाजवादी पार्टी कांग्रेस को 70 से 80 से ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं है. ऐसे में राजेंद्र पाल गौतम का ‘बराबर हिस्सेदारी’ वाला बयान सीधे तौर पर अखिलेश यादव की पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जब 2017 में सपा सत्ता में थी, तब भी उन्होंने कांग्रेस को 105 सीटें दी थीं तो इस बार उनका हिस्सा और बड़ा होना चाहिए. कांग्रेस रणनीतिकारों को लगता है कि चूंकि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने की रेस में हैं, इसलिए वे कांग्रेस को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाएंगे. उनका मानना है कि यदि कांग्रेस को गठबंधन में मजबूत भूमिका मिलती है तो वह सपा के पाले में दलित और ब्राह्मण वोटों का ट्रांसफर आसानी से करवा सकती है.

मायावती पर डोरे और कांसीराम कार्ड: राजेंद्र पाल गौतम ने बातचीत के दौरान बसपा प्रमुख मायावती को भी साथ आने का न्योता दिया. उन्होंने कहा, “संविधान और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए बहुजन समाज के मुद्दों पर काम करने वाले सभी लोगों को इस दमनकारी मनुवादी सरकार के खिलाफ एकजुट होना चाहिए.” मायावती की तारीफ करते हुए गौतम ने कहा, “बहनजी हमारे समाज की एक बड़ी और कद्दावर नेता हैं, हम उनका सम्मान करते हैं. वे हमेशा एक मजबूत नेता रही हैं. समझ नहीं आता कि आज उनकी क्या मजबूरियां हैं.”

दिलचस्प बात यह है कि पिछले महीने ही राजेंद्र पाल गौतम अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ बिना किसी तय कार्यक्रम के लखनऊ में मायावती के घर पहुंचे थे, हालांकि तब उनकी मुलाकात नहीं हो पाई थी.

चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते कद को रोकने की रणनीति: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय से आने वाले सांसद चंद्रशेखर आजाद का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में दलित समुदाय के ही राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का जिम्मा सौंपकर कांग्रेस एक तीर से दो निशाने साधना चाहती है. वह मायावती के छिटक रहे दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के साथ-साथ चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते प्रभाव को भी नियंत्रित करना चाहती है. यही वजह है कि अब कांग्रेस के कार्यक्रमों में मान्यवर कांसीराम की तस्वीरें भी दिखाई देने लगी हैं.

भले ही राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच बेहतर तालमेल की वजह से अंत में कोई बीच का रास्ता निकल आए, लेकिन नए प्रभारी के इन बयानों ने समाजवादी पार्टी के भीतर असहजता जरूर पैदा कर दी है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज 2 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि सपा ने 111 सीटें जीती थीं. अब देखना होगा कि जमीन पर कमजोर सांगठनिक ढांचे के बावजूद कांग्रेस का यह बराबर का दांव कितना कामयाब होता है.

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