महिला आरक्षण बिल के पास न होने पर रो पड़ीं नवनीत राणा, बोलीं- ‘विपक्ष ने महिलाओं का अधिकार छीना’

लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण से जुड़ा बहुप्रतीक्षित संविधान संशोधन बिल शुक्रवार को पास नहीं हो सका, जिससे देश की राजनीति में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। इस बिल को लेकर लंबे समय से उम्मीदें थीं कि यह महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बड़ा अवसर देगा, लेकिन वोटिंग के दौरान यह उम्मीद टूट गई।

संसद में क्या हुआ?
महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए कम से कम 352 वोटों की आवश्यकता थी। हालांकि, जब वोटिंग हुई तो बिल के पक्ष में केवल 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 वोट आए। आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण यह बिल गिर गया। इसके साथ ही इससे जुड़े अन्य दो विधेयक भी स्वतः निरस्त हो गए।गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बहस के दौरान विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए बिल के समर्थन में तर्क रखे। उन्होंने विपक्ष को समझाने की कोशिश की कि यह कानून महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन विपक्षी दल अपनी मांगों और आपत्तियों पर अड़े रहे।
नवनीत राणा की भावुक प्रतिक्रिया
इस घटनाक्रम के बाद अमरावती की पूर्व सांसद नवनीत राणा ने अपनी गहरी नाराज़गी और दुख जाहिर किया। मीडिया से बात करते हुए वह भावुक हो गईं और अपने आंसू नहीं रोक सकीं। उन्होंने कहा कि जो लोग इस बिल का विरोध कर रहे हैं, उन्हें देश की महिलाएं कभी माफ नहीं करेंगी।उनके शब्दों में, यह दिन महिलाओं के लिए एक “काला दिन” बन गया है। उनका मानना है कि इस फैसले ने महिलाओं के अधिकारों को पीछे धकेल दिया है और यह केवल राजनीतिक स्वार्थ का परिणाम है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
नवनीत राणा ने विपक्षी दलों पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने इस मुद्दे को संसद तक लाने का साहस दिखाया और देश की महिलाओं के लिए एक बड़ा कदम उठाया।दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि इस बिल में कई खामियां हैं और इसे वर्तमान स्वरूप में लागू करना उचित नहीं है। कुछ दलों ने यह भी कहा कि इसमें सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया।
महिलाओं पर क्या असर?
महिला आरक्षण बिल का उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करना था, जिससे उनकी भागीदारी बढ़ सके। इस बिल के पास न होने से महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा मौका फिलहाल टल गया है।देशभर में महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस फैसले पर निराशा जताई है। उनका मानना है कि राजनीतिक मतभेदों के कारण महिलाओं के अधिकारों को पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस बिल को दोबारा पेश करेगी या इसमें बदलाव कर फिर से समर्थन जुटाने की कोशिश करेगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा फिर से जोर पकड़ सकता है, खासकर चुनावी माहौल में।
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