भाजपा की ‘टीम नबीन’ में हारे चेहरों पर फिर भरोसा, सारा जोर UP पर; साधा OBC-मुस्लिम समीकरण

✍️NNS Desk
भाजपा की ‘टीम नबीन’ में हारे चेहरों पर फिर भरोसा, सारा जोर UP पर; साधा OBC-मुस्लिम समीकरण

भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में यूपी और उत्तराखंड के नेताओं को मिली बड़ी जिम्मेदारियों के पीछे 2027 के चुनाव की रणनीति भी दिखाई दे रही है. यूपी में ओबीसी, महिला और मुस्लिम समाज तक पहुंच मजबूत करने की कोशिश है तो उत्तराखंड में धामी मॉडल और अनुभवी नेताओं पर भरोसा जताया गया है.

सोमवार को ऐलान गयी राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कई बड़े नेताओं को अहम जिम्मेदारी मिली है. पहली नजर में इसे संगठन में बदलाव की सामान्य प्रक्रिया माना जा सकता है. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव को सामने रखकर देखें तो इस पूरी तस्वीर के कई राजनीतिक मतलब निकलते हैं. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में राष्ट्रीय संगठन में इन दोनों राज्यों के नेताओं को मिली जगह को सिर्फ पद और जिम्मेदारी के तौर पर देखना ठीक नहीं होगा.

खासकर उत्तर प्रदेश की टीम पर नजर डालें तो यहां भाजपा ने महिला नेताओं से लेकर ओबीसी और मुस्लिम चेहरों तक कई सामाजिक वर्गों को साधने की कोशिश की है. वहीं पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल और अवध तक अलग-अलग इलाकों को भी जगह दी गई है. उत्तराखंड में कहानी थोड़ी अलग है. यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे को आगे रखते हुए पुराने और अनुभवी नेताओं को संगठन की बड़ी जिम्मेदारी दी गई है. सवाल यही है कि आखिर 2027 से पहले भाजपा की नई टीम क्या संदेश दे रही है और जिन नेताओं को आगे किया गया है उनके पीछे कौन सा राजनीतिक गणित काम कर रहा है?

यूपी पर इतना जोर क्यों? उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सबसे अहम राज्यों में है. 80 लोकसभा सीटों वाला यह राज्य विधानसभा चुनाव के लिहाज से भी पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी में बड़ा झटका लगा था. पार्टी के कई बड़े नेता चुनाव हार गए. अमेठी से स्मृति ईरानी को हार मिली. बस्ती से हरीश द्विवेदी चुनाव नहीं जीत सके और धौरहरा से रेखा वर्मा को भी हार का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद पार्टी ने इन नेताओं को संगठन से बाहर नहीं किया. नई टीम में इन्हें अहम जिम्मेदारी दी गई है. यही इस पूरी कवायद का पहला बड़ा संकेत है. भाजपा चुनाव हार चुके नेताओं को भी संगठन की ताकत के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है. यानी किसी सीट पर चुनाव हारना पार्टी के लिए राजनीतिक सफर का अंत नहीं है. अगर नेता संगठन चला सकता है और अलग-अलग इलाकों में पार्टी के लिए काम कर सकता है तो उसे नई भूमिका दी जा सकती है.

स्मृति ईरानी की वापसी में छिपा बड़ा संदेश: स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमेठी से राहुल गांधी को हराकर बड़ी राजनीतिक जीत हासिल की थी. इसके बाद केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली. 2024 में अमेठी से हार के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कई सवाल उठे थे. अब राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी देकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि स्मृति ईरानी की राजनीति खत्म नहीं हुई है. उनकी नई भूमिका और बड़ी हो गई है. स्मृति ईरानी भाजपा का बड़ा महिला चेहरा हैं और महिला मोर्चे से लेकर केंद्र सरकार तक संगठन और सरकार दोनों का अनुभव उनके पास है. 2027 के यूपी चुनाव में महिला मतदाता बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली हैं. ऐसे में स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय स्तर पर आगे करना महिला वोटरों के बीच पार्टी की पहुंच को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. दिलचस्प बात यह है कि अमेठी की हार के बाद स्मृति को किसी एक लोकसभा सीट तक सीमित नहीं किया गया. अब उनकी भूमिका पूरे संगठन में दिखाई देगी.

हरीश द्विवेदी को भी मिला भरोसा: बस्ती के हरीश द्विवेदी भी नई टीम में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हैं. वह 2014 और 2019 में बस्ती से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. उत्तर प्रदेश भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और अलग-अलग राज्यों के प्रभारी के तौर पर भी काम कर चुके हैं. 2024 में बस्ती से हारने के बाद भी पार्टी ने उन पर भरोसा बनाए रखा. इसकी एक वजह उनका संगठनात्मक अनुभव माना जा सकता है. कुछ दिन पहले ही उन्हें राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव का प्रभारी बनाया गया था. अब राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी मिलने से यह साफ है कि पार्टी उन्हें सिर्फ बस्ती या उत्तर प्रदेश के नेता के तौर पर नहीं देख रही. उनकी भूमिका अब संगठन के बड़े दायरे में होगी. चुनावी राजनीति में हार और संगठनात्मक उपयोगिता को अलग-अलग देखने की यह रणनीति भाजपा के लिए आगे काफी काम आ सकती है.

अब समझिए भाजपा का ओबीसी वाला दांव: नई टीम का सबसे दिलचस्प हिस्सा जातीय समीकरण से जुड़ा है. अमरपाल मौर्य को ओबीसी मोर्चे की राष्ट्रीय जिम्मेदारी दी गई है. वह उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन में प्रदेश महामंत्री जैसी अहम भूमिका निभा चुके हैं और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं. मौर्य समाज के साथ शाक्य और सैनी समाज में भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओबीसी कोई एक वोट बैंक नहीं है. इसके भीतर कई जातियां हैं और अलग-अलग इलाकों में उनका राजनीतिक प्रभाव भी अलग है. भाजपा लंबे समय से गैर-यादव ओबीसी को अपने मजबूत सामाजिक आधार के रूप में देखती रही है. 2027 में भी पार्टी इस आधार को बनाए रखना चाहेगी. ऐसे में अमरपाल मौर्य को राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी मोर्चे की जिम्मेदारी देना केवल संगठन का फैसला नहीं है. इसके जरिए पार्टी पिछड़े वर्ग के अलग-अलग हिस्सों तक अपनी पहुंच को और मजबूत करना चाहती है.

संगीता यादव में भी कई समीकरण: संगीता यादव को राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया है. वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं और इससे पहले चौरी-चौरा विधानसभा सीट से विधायक रह चुकी हैं. भाजपा महिला मोर्चे में राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं. उनकी राजनीतिक पहचान पूर्वांचल की महिला नेता के साथ एक प्रमुख ओबीसी चेहरे की भी है. इसलिए उनकी नियुक्ति को सिर्फ महिला प्रतिनिधित्व के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताएगा. उनके जरिए पार्टी एक साथ कई सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों तक पहुंच बना सकती है. महिला मतदाता और ओबीसी समाज के साथ पूर्वांचल का समीकरण उनके राजनीतिक प्रोफाइल से जुड़ता है. यही वजह है कि उनकी भूमिका 2027 के चुनाव से पहले महत्वपूर्ण मानी जा सकती है.

मुस्लिम समाज के लिए क्या संदेश? अब उस हिस्से पर आते हैं जिस पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी. भाजपा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है. वह अभी उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं. डॉक्टर और शिक्षक रहे तारिक मंसूर का राजनीतिक सफर पारंपरिक नेताओं से अलग है. भाजपा के भीतर उन्हें मुस्लिम समाज के प्रमुख प्रबुद्ध चेहरों में गिना जाता है. पसमांदा मुस्लिम समाज और शिक्षा के क्षेत्र में पार्टी की नीतियों को आगे बढ़ाने की कोशिशों में भी उनका नाम सामने आता रहा है. भाजपा पिछले कुछ समय से मुस्लिम समाज के उन वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं. तारिक मंसूर इस रणनीति में एक अलग तरह का चेहरा देते हैं. उनके जरिए पार्टी सिर्फ वोट की राजनीति नहीं बल्कि शिक्षा और सामाजिक मुद्दों के जरिए मुस्लिम समाज के एक हिस्से से संवाद बढ़ाने की कोशिश करती दिखाई देती है.

बासित अली की जिम्मेदारी क्यों अहम? कुंवर बासित अली को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चे का अध्यक्ष बनाया गया है. वह उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष रह चुके हैं और राज्य में मुस्लिम समाज के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने के अभियान में सक्रिय रहे हैं. कुंदरकी विधानसभा सीट पर भाजपा की जीत के दौरान भी उनकी भूमिका चर्चा में रही थी. अब यूपी की टीम से सीधे राष्ट्रीय संगठन में पहुंचना उनके लिए बड़ा प्रमोशन है. तारिक मंसूर और बासित अली को एक साथ देखें तो भाजपा की रणनीति ज्यादा साफ दिखाई देती है. एक तरफ पार्टी के पास प्रबुद्ध मुस्लिम चेहरा है तो दूसरी तरफ जमीनी संगठन से जुड़ा नेता है. यानी मुस्लिम समाज तक पहुंच के लिए पार्टी एक ही रास्ते पर निर्भर नहीं रहना चाहती. शिक्षा और सामाजिक संवाद से लेकर जमीनी संगठन तक अलग-अलग स्तर पर काम करने की कोशिश है.

रेखा वर्मा को बरकरार रखना भी संकेत: धौरहरा से दो बार सांसद रह चुकीं रेखा वर्मा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर बरकरार रखा गया है. 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्हें राष्ट्रीय संगठन में जगह मिली है. रेखा वर्मा अवध क्षेत्र की मजबूत महिला नेताओं में गिनी जाती हैं. उन्हें उत्तराखंड भाजपा का सह प्रभारी भी बनाया जा चुका है. उनकी मौजूदगी से भाजपा को महिला प्रतिनिधित्व के साथ अवध क्षेत्र का राजनीतिक आधार भी मिलता है. उनकी नियुक्ति एक और बात बताती है कि पार्टी के लिए चुनावी हार के बाद भी संगठन में किसी नेता की उपयोगिता खत्म नहीं होती. अगर कोई नेता किसी क्षेत्र में संगठन खड़ा कर सकता है तो पार्टी उसे दूसरे स्तर पर इस्तेमाल करने का रास्ता खुला रखती है.

भोला सिंह के जरिए पश्चिमी यूपी: बुलंदशहर के सांसद भोला सिंह को राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया है. वह लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के मजबूत जमीनी नेताओं में गिने जाते हैं. पश्चिमी यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण के साथ किसान मुद्दे और मुस्लिम मतदाता भी कई सीटों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे में राष्ट्रीय टीम में पश्चिमी यूपी के एक मजबूत जमीनी चेहरे को जगह देना पार्टी के लिए अहम हो सकता है. भोला सिंह की जिम्मेदारी सिर्फ संगठन के भीतर नहीं रहेगी. उनके अनुभव का इस्तेमाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के संदेश और संगठन को मजबूत करने के लिए भी किया जा सकता है.

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