निर्दोष को जेल भेजा तो पुलिस भरेगी 25 हजार का जुर्माना, शांति भंग के फर्जी मामलों पर इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला

✍️NNS Desk
निर्दोष को जेल भेजा तो पुलिस भरेगी 25 हजार का जुर्माना, शांति भंग के फर्जी मामलों पर इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आदेश दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है और किसी भी नागरिक को बिना कानूनी आधार के मनमाने ढंग से हिरासत में रखना अब पुलिस अधिकारियों को भारी पड़ेगा.

अक्सर यह देखने में आता है कि ‘शांति भंग’ की आड़ में पुलिस निर्दोष लोगों को बिना किसी ठोस आधार के हिरासत में ले लेती है. कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि पुलिस अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं कर सकती. अब किसी भी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखना गैर-कानूनी माना जाएगा.

अवैध हिरासत का भुगतान सीधे अफसरों की जेब से: कोर्ट के इस आदेश का सबसे सख्त पहलू मुआवजे का प्रावधान है. यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखता है, तो उसे पीड़ित को ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देना होगा. विशेष रूप से, यदि किसी व्यक्ति को 8 दिनों तक गलत तरीके से हिरासत में रखा गया है, तो उसे ₹2 लाख का हर्जाना दिया जाएगा. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जुर्माना सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से काटा जाएगा। इससे पुलिस प्रशासन में जवाबदेही तय होगी.

पूरे यूपी में लागू होंगे निर्देश: यह आदेश केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के लिए एक कड़ा संदेश है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. कानून का शासन सर्वोपरि है और पुलिस को अपनी कार्यशैली में तत्काल सुधार करना होगा.

प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को जवाबदेही तय: मामले की गंभीरता को देखते हुए, हाईकोर्ट ने प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर को तलब किया है. कोर्ट ने उन्हें आदेश दिया है कि वे 14 सितंबर तक इस निर्णय के अनुपालन के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट पेश करें.

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश आम जनता के लिए एक बड़ी राहत है. यह उन लोगों के लिए एक ढाल का काम करेगा जिन्हें पुलिस उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. कोर्ट के इस सख्त रुख से उम्मीद है कि भविष्य में पुलिस अपनी शक्तियों का प्रयोग अधिक जिम्मेदारी और कानून के दायरे में रहकर करेगी, जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सकेगी.

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