Pahalgam terror attack: पहलगाम आतंकी हमले में बेटे को खोने वाले संजय द्विवेदी की आंखें नम, बोले ‘शुभम की मुस्कान आज भी साथ चलती है’

✍️By: Nation Now Samachar Desk
पहलगाम आतंकी हमले में बेटे को खोने वाले संजय द्विवेदी की आंखें नम, बोले– ‘शुभम की मुस्कान आज भी साथ चलती है’

Pahalgam terror attack: आज का दिन कभी भूलाया ही नही जा सकता है। कानपुर से सामने आई यह कहानी सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं है, बल्कि उस गहरे भावनात्मक खालीपन को दिखाती है जो किसी अपने को खोने के बाद रह जाता है। पहलगाम आतंकी हमले में अपने इकलौते बेटे शुभम द्विवेदी को खोने वाले पिता संजय द्विवेदी आज भी उस दर्द को महसूस करते हैं, जो समय के साथ कम नहीं हुआ है।संजय द्विवेदी बताते हैं कि शुभम बचपन से ही बेहद होशियार, समझदार और मिलनसार स्वभाव का था। उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी और वह जहां भी जाता, लोगों को अपनी सादगी और व्यवहार से अपना बना लेता था। घर में उसकी मौजूदगी एक अलग ऊर्जा लेकर आती थी, जो अब गहरी खामोशी में बदल चुकी है।

हर कोने में बसती है बेटे की याद

संजय द्विवेदी कहते हैं कि आज भी ऐसा लगता है जैसे शुभम कहीं आस-पास ही है। घर का हर कोना, हर चीज उसकी याद दिलाती है। उसकी हंसी, उसकी बातें और उसका मुस्कुराता चेहरा अब सिर्फ यादों में ही रह गया है।वह भावुक होकर बताते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा दर्द देखना पड़ेगा, जब उनका इकलौता बेटा उनसे दूर हो जाएगा। यह नुकसान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे परिवार की जिंदगी को बदल देने वाला है।

जिम्मेदारियों का बोझ और नया संघर्ष

बेटे की मौत के बाद अब संजय द्विवेदी ने परिवार की सारी जिम्मेदारियां खुद संभाल ली हैं। पहले जिन कामों को शुभम करता था, अब वे उन्हें पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।वे कहते हैं कि दर्द बहुत गहरा है, लेकिन परिवार को संभालना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए वह खुद को मजबूत रखने की कोशिश करते हैं, ताकि घर में स्थिरता बनी रहे।

बहू नहीं, बेटी जैसी है परिवार का सहारा

इस मुश्किल समय में परिवार के भीतर रिश्तों की मजबूती सबसे बड़ा सहारा बनी हुई है। संजय द्विवेदी अपनी बहू के बारे में कहते हैं कि वह उनके लिए बेटी की तरह है।परिवार ने उसे हमेशा बेटी जैसा सम्मान दिया है और वह भी उसी भाव से घर में रहती है। संजय द्विवेदी का कहना है कि अगर बहू कभी अपने किसी सपने या इच्छा के बारे में बताएगी, तो उसे पूरा करना उनका कर्तव्य होगा।

दुख के बीच एक-दूसरे का सहारा

यह परिवार अब दर्द के बावजूद एक-दूसरे के सहारे जीने की कोशिश कर रहा है। संजय द्विवेदी मानते हैं कि दुख बड़ा है, लेकिन साथ रहने से हिम्मत मिलती है।घर में अब भी शुभम की यादें जीवित हैं, लेकिन उन यादों के साथ परिवार आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। यह कहानी केवल एक दुखद घटना नहीं, बल्कि उस मानवीय हिम्मत की भी तस्वीर है, जो टूटकर भी संभलने की कोशिश करती है।

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