कानपुर देहात : रनिया में आशा दूज का पर्व धूमधाम से मनाया, मां कन्हैया देवी की पूजा-अर्चना हुई

✍️Amisha Sachan
कानपुर देहात : रनिया में आशा दूज का पर्व धूमधाम से मनाया, मां कन्हैया देवी की पूजा-अर्चना हुई

कानपुर देहात के रनिया क्षेत्र में आज आशा दूज का पावन पर्व पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर मां कन्हैया देवी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना में शामिल हुईं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की लंबी आयु तथा वंश वृद्धि की कामना की।

सुबह से ही रनिया क्षेत्र के विभिन्न गांव और मोहल्लों में धार्मिक माहौल देखने को मिला। महिलाएं मंदिरों और घरों में स्थापित पूजन स्थलों पर पहुंचकर कलश स्थापना कर रोली, अक्षत, धूप-दीप के साथ पूजा की। इस अवसर पर हलवा-पूरी का भोग अर्पित किया गया। पूजा के दौरान ‘आस माता’ की कथा का श्रवण किया गया, जिसमें ‘आसलिया बावलिया’ की कथा सुनाई गई। कथा में जीवन में आस्था, संयम और परिवार के प्रति समर्पण का संदेश दिया गया।

व्रत रखने वाली महिलाओं ने पूरे दिन निर्जल या फलाहार व्रत रखकर परिवार की खुशहाली और समृद्धि की प्रार्थना की। जिन परिवारों में हाल ही में बेटे का जन्म या विवाह हुआ है, वहां विशेष रूप से उद्यापन की परंपरा निभाई गई। इस अवसर पर सास को ‘बायना’ देकर आशीर्वाद प्राप्त किया गया।

आस्था और धार्मिक महत्व की दृष्टि से आशा दूज का व्रत उत्तर भारत में विशेष स्थान रखता है। इस दिन महिलाएं अपने परिवार की कल्याण, संतान सुख और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पूजा करती हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा करने पर मां आस माता की कृपा से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।रनिया में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। मंदिरों में भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया और महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा कर एक-दूसरे को बधाई देती रहीं। पूरे क्षेत्र में सकारात्मक और धार्मिक वातावरण बना रहा।

आस्था के साथ-साथ आशा दूज ने सामाजिक एकता और पारंपरिक संस्कृति को भी मजबूती दी। महिलाएं इस अवसर पर अपने परंपरागत रीति-रिवाज निभाकर संस्कृति के संरक्षण में भागीदार बनीं। इस दिन की गतिविधियां न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण रही।

समारोह में उपस्थित स्थानीय नागरिकों ने इस पर्व के महत्व पर जोर दिया और कहा कि आशा दूज केवल पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह समुदाय में भाईचारे, सहयोग और परिवार के प्रति जिम्मेदारी की भावना को भी बढ़ावा देता है।रनिया क्षेत्र में आशा दूज का यह पर्व इस बात का उदाहरण है कि कैसे धार्मिक परंपरा और सामाजिक सहभागिता मिलकर एक मजबूत और सकारात्मक समुदाय का निर्माण करती है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और उत्साह ने इस पर्व को और भी विशेष बना दिया।

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