“वाह मास्टर जी!”: संभल में कक्षा-3 की छात्रा को मिला कक्षा-5 का रिजल्ट, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

✍️Amisha Sachan
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उत्तर प्रदेश के संभल जिले से शिक्षा व्यवस्था की एक हैरान करने वाली लापरवाही सामने आई है। यहां एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली कक्षा-3 की छात्रा माहिरा को गलती से कक्षा-5 का रिजल्ट कार्ड दे दिया गया। इस घटना ने न केवल छात्रा के परिवार को परेशान किया है, बल्कि पूरे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले के अनुसार, माहिरा एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में कक्षा-3 में पढ़ती है, जो यूपी के बेसिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत आता है। जब परीक्षा परिणाम का समय आया, तो उसे जो रिजल्ट कार्ड दिया गया, उसमें कक्षा-5 पास दर्शाया गया था। यह गलती देखकर परिवार पहले तो हैरान रह गया, लेकिन जब उन्होंने स्कूल प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा, तो स्थिति और भी उलझ गई।

— NATION NOW समाचार (@nnstvlive) April 14, 2026

परिजनों का कहना है कि जब उन्होंने इस गलती को लेकर सवाल किया, तो स्कूल के एक शिक्षक ने उन्हें यह कहकर आश्वस्त करने की कोशिश की कि बच्ची का एडमिशन अगले स्तर यानी जूनियर सेक्शन में कक्षा-6 में करवा दिया जाएगा और इसके लिए उन्होंने पहले से बात भी कर ली है। लेकिन इस जवाब से परिवार संतुष्ट नहीं हुआ।

माहिरा की मां का कहना है कि उनकी बेटी को कक्षा-4 और कक्षा-5 का कोई भी सिलेबस ठीक से पढ़ाया ही नहीं गया है। ऐसे में उसे सीधे कक्षा-6 में भेज देना उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ जैसा है। उनका मानना है कि जब बच्ची ने अभी तक बुनियादी स्तर की पढ़ाई भी पूरी नहीं की है, तो वह उच्च कक्षाओं का बोझ कैसे संभाल पाएगी।

यह मामला केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं लगता, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है। सरकारी स्कूलों में रिकॉर्ड मेंटेनेंस, परीक्षा परिणाम और छात्र प्रोन्नति प्रक्रिया में ऐसी गलतियां यह दिखाती हैं कि जमीनी स्तर पर निगरानी की कमी है।विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में बच्चों के शैक्षणिक विकास पर सीधा असर पड़ता है। अगर किसी छात्र को बिना सही तैयारी के अगली कक्षा में भेज दिया जाए, तो वह न केवल पढ़ाई में पिछड़ सकता है, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी प्रभावित हो सकता है।

इस घटना ने अभिभावकों के बीच भी चिंता बढ़ा दी है। वे सवाल उठा रहे हैं कि जब बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूलों में इस तरह की गलतियां हो सकती हैं, तो बच्चों के भविष्य की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।सोशल मीडिया पर भी यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग इसे शिक्षा विभाग की लापरवाही और सिस्टम की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक गलती नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की बड़ी चूक है।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस मामले में क्या कदम उठाते हैं। क्या इस गलती को सुधारकर सही मूल्यांकन किया जाएगा, या फिर इसे सामान्य प्रशासनिक त्रुटि मानकर छोड़ दिया जाएगा।फिलहाल, यह घटना शिक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी की तरह है कि बच्चों के भविष्य से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

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