कानपुर में बड़ी कार्रवाई,टाइपिंग टेस्ट में फेल हुए 3 बाबू बने चपरासी, DM का सख्त फैसला

✍️Amisha Sachan
कानपुर में बड़ी कार्रवाई,टाइपिंग टेस्ट में फेल हुए 3 बाबू बने चपरासी, DM का सख्त फैसला

उत्तर प्रदेश के कानपुर से प्रशासनिक सख्ती की एक बड़ी खबर सामने आई है। जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने मंगलवार को तीन बाबुओं (क्लर्कों) को डिमोट करते हुए चपरासी बना दिया। यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि तीनों कर्मचारी निर्धारित टाइपिंग मानक को पूरा नहीं कर पाए।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, प्रेमनाथ यादव, अमित कुमार यादव और नेहा श्रीवास्तव को मृतक आश्रित कोटे के तहत जूनियर क्लर्क के पद पर नियुक्त किया गया था। नियमों के मुताबिक, नौकरी जॉइन करने के एक साल के भीतर टाइपिंग टेस्ट पास करना अनिवार्य होता है।हालांकि, तीनों कर्मचारियों को दो साल के भीतर दो बार टाइपिंग टेस्ट का मौका दिया गया, लेकिन वे दोनों बार असफल रहे। प्रशासन के अनुसार, वे एक मिनट में 25 शब्द भी टाइप नहीं कर सके, जो न्यूनतम योग्यता मानी जाती है।

दो बार मिला मौका, फिर भी नहीं सुधार

पहली बार साल 2024 में इन कर्मचारियों का टाइपिंग टेस्ट कराया गया था। उस समय भी वे मानक पूरा नहीं कर पाए थे। इसके बावजूद प्रशासन ने उन्हें सुधार का मौका दिया।इसके बाद साल 2025 में दोबारा टेस्ट आयोजित किया गया, लेकिन इस बार भी तीनों कर्मचारी असफल रहे। लगातार दो बार फेल होने के बाद प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया।

डीएम का सख्त फैसला

मामले की समीक्षा के बाद जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने सख्त कार्रवाई करते हुए तीनों को जूनियर क्लर्क के पद से हटाकर चतुर्थ श्रेणी (चपरासी) में भेज दिया। इसके साथ ही उनकी वेतन वृद्धि पर भी रोक लगा दी गई है।डीएम ने स्पष्ट कहा कि कलेक्ट्रेट में टाइपिंग का काम बेहद महत्वपूर्ण होता है। फाइलों की नोटिंग और दस्तावेज तैयार करने के लिए यह एक बुनियादी कौशल है। ऐसे में यदि कोई कर्मचारी इस मानक को पूरा नहीं करता, तो कार्रवाई करना आवश्यक हो जाता है।

प्रशासन का स्पष्ट संदेश

इस कार्रवाई के जरिए प्रशासन ने यह साफ संदेश दिया है कि सरकारी नौकरी में केवल नियुक्ति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आवश्यक कौशल को बनाए रखना और विकसित करना भी जरूरी है।विशेष रूप से कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए टाइपिंग जैसी बुनियादी दक्षता अनिवार्य मानी जाती है।

मृतक आश्रित कोटे पर भी नियम लागू

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संबंधित कर्मचारियों की नियुक्ति मृतक आश्रित कोटे से हुई थी। आमतौर पर इस कोटे में नियुक्ति पाने वाले कर्मचारियों को सहानुभूति के आधार पर मौका दिया जाता है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें निर्धारित नियमों और योग्यता को पूरा करना होता है।इस कार्रवाई से यह स्पष्ट हो गया है कि नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे नियुक्ति किसी भी आधार पर हुई हो।

कर्मचारियों के लिए सबक

यह घटना अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए भी एक सीख है कि वे अपनी कार्यक्षमता और कौशल को लगातार बेहतर बनाते रहें। नौकरी मिलने के बाद भी प्रशिक्षण और दक्षता बनाए रखना उतना ही जरूरी है।

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