औरैया: LPG की किल्लत के दौर में आत्मनिर्भर गांव, गोबर गैस से जल रहे चूल्हे।

✍️Amisha Sachan
LPG की किल्लत के दौर में आत्मनिर्भर गांव, गोबर गैस से जल रहे चूल्हे।

औरैया: रिपोर्टर- अमित शर्मा देश के कई हिस्सों में समय-समय पर रसोई गैस की कमी देखने को मिलती है। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश के औरैया जिले का एक छोटा सा गांव आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर सामने आया है। यहां के कई परिवार पिछले करीब दस वर्षों से गोबर गैस संयंत्र के जरिए अपने घरों की रसोई चला रहे हैं। यह पहल न केवल रसोई गैस पर निर्भरता कम कर रही है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी एक सकारात्मक उदाहरण बन रही है।

औरैया जिले के भाग्यनगर ब्लॉक का परवाहा गांव इन दिनों अपनी अनोखी पहल के कारण चर्चा में है। करीब 60 परिवारों वाले इस गांव में लगभग 15 घरों में गोबर गैस संयंत्र लगाए गए हैं। इन संयंत्रों की मदद से ग्रामीण मवेशियों के गोबर से गैस तैयार करते हैं और उसी गैस से अपने घरों में खाना बनाते हैं।ग्रामीणों का कहना है कि इस व्यवस्था ने उनके जीवन में काफी बदलाव लाया है। पहले जहां उन्हें एलपीजी गैस सिलेंडर पर निर्भर रहना पड़ता था, वहीं अब वे स्थानीय संसाधनों की मदद से ऊर्जा तैयार कर रहे हैं। इससे रसोई का खर्च भी काफी कम हो गया है।

गोबर गैस संयंत्र का एक और बड़ा फायदा यह है कि इससे निकलने वाला अवशेष बेकार नहीं जाता। गैस बनने के बाद जो स्लरी बचती है, उसे ग्रामीण खेतों में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इससे फसलों की पैदावार बेहतर होती है और रासायनिक खाद पर निर्भरता भी कम हो जाती है।परवाहा गांव के निवासी बताते हैं कि लगभग दस साल पहले गांव में गोबर गैस संयंत्र लगाए गए थे। उस समय ग्रामीणों को उम्मीद नहीं थी कि यह व्यवस्था इतनी उपयोगी साबित होगी। लेकिन समय के साथ लोगों ने देखा कि इससे रसोई का खर्च कम हुआ और खेतों के लिए अच्छी गुणवत्ता की खाद भी मिलने लगी।

हालांकि, अब इन संयंत्रों के सामने कुछ चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। कई संयंत्र पुराने हो चुके हैं और उनमें तकनीकी खराबी आने लगी है। ग्रामीणों के अनुसार, गोबर गैस संयंत्र से जुड़े उपकरण आसानी से बाजार में उपलब्ध नहीं हो पाते। इससे उन्हें मरम्मत कराने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।गांव के निवासी विश्वनाथ बताते हैं कि गोबर गैस संयंत्र से उन्हें काफी फायदा मिला है, लेकिन कई संयंत्र अब खराब हो गए हैं। उपकरण और तकनीकी सहायता की कमी के कारण उन्हें ठीक कराने में काफी समय लग जाता है। अगर समय पर मरम्मत हो जाए तो यह व्यवस्था और बेहतर तरीके से चल सकती है।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर सरकार और संबंधित विभाग इस दिशा में थोड़ी मदद करें तो गांव के और भी घरों में गोबर गैस संयंत्र लगाए जा सकते हैं। इससे गांव पूरी तरह से स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा के मॉडल के रूप में विकसित हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बायोगैस ऊर्जा का एक बेहद प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल स्रोत है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पशुपालन आम बात है, वहां गोबर गैस संयंत्र आसानी से स्थापित किए जा सकते हैं। इससे न केवल ऊर्जा की समस्या का समाधान होता है बल्कि स्वच्छता और जैविक खेती को भी बढ़ावा मिलता है।

परवाहा गांव की यह पहल दिखाती है कि अगर स्थानीय संसाधनों का सही तरीके से उपयोग किया जाए तो ग्रामीण क्षेत्र ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बन सकते हैं। यह मॉडल अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

आज जब देश में स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ विकास की बात हो रही है, तब परवाहा गांव का यह प्रयास एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में सामने आया है। अगर इन संयंत्रों की समय-समय पर देखरेख और मरम्मत होती रहे, तो यह पहल लंबे समय तक ग्रामीणों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

गांव के लोगों को उम्मीद है कि आने वाले समय में प्रशासन उनकी समस्याओं पर ध्यान देगा और गोबर गैस संयंत्रों की मरम्मत तथा जरूरी उपकरण उपलब्ध कराएगा। अगर ऐसा होता है, तो परवाहा गांव न सिर्फ औरैया बल्कि पूरे प्रदेश के लिए आत्मनिर्भर ऊर्जा का मॉडल बन सकता है।

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