अखिलेश के ‘चवन्नी छाप’ तंज पर सियासत गरमायी: मायावती बोलीं माफ़ी मांगो, जयंत बोले-‘हिम्मत है तो मेरा नाम लेकर कहो’

विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही प्रदेश की सियासत गरमाने लगी है. सबसे ज्यादा हलचल पश्चिमी यूपी में है और इसकी वजह है जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के बीच जुबानी जंग चल रही. राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी पर की गयी सपा प्रमुख की चवन्नी वाली टिप्पणी ने अब नया रंग ले लिया है.अब रालोद के साथ-साथ बहुजन समाज पार्टी भी आक्रामक हो गई है.
ई ‘चवन्नी’ वाली टिप्पणी ने लिया बड़ा राजनीतिक रूप: सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा जयंत चौधरी पर की गई ‘चवन्नी’ वाली टिप्पणी ने अब बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है. रालोद ने जहां इस बयान को सीधे-सीधे जाट समुदाय के स्वाभिमान से जोड़ दिया है.
जयंत के समर्थन में मायावती: वहीं सपा अखिलेश यादव के चवन्नी वाले बयान के विरोध में जहां एक तरफ रालोद ने इसे जाट समुदाय से जोड़ दिया है तो वही रालोद के बाद बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती भी रालोद प्रमुख जयंत चौधरी के समर्थन में आ गई हैं. उन्होंने कहा कि सपा मुखिया को जाटों से माफी मांगनी चाहिए.
मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत और आसपास की सीटों पर जाट वोट का सबसे ज्यादा असर दिखेगा. यहां सपा भी अपने पुराने जाट-मुस्लिम आधार को वापस पाने की कोशिश कर रही है. उत्तर प्रदेश में पश्चिमी यूपी (जाटलैंड) में जाट समुदाय की संख्या लगभग 15 से 20% के बीच आती है, जो लोकसभा और विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है. कुछ क्षेत्रों जैसे बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली, मथुरा, सहारनपुर जैसे जिलों में जाट वोटर 15 से 2 फीसदी तक पहुंचते हैं. पश्चिमी यूपी में 17-20% के करीब जाट वोटर हैं. जाट वोट बैंक कई सीटों पर हार-जीत फैसला कर सकता है.
जाट बाहुल्य 11 जिलों में सबसे ज्यादा असर: पश्चिमी यूपी के करीब 11 जिलों में जाट मतदाता सबसे ताकतवर और असरदार माने जाते हैं. इस क्षेत्र की राजनीतिक लड़ाई मुख्य रूप से बीजेपी, राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी के बीच जाट-मुस्लिम समीकरण और किसान हितों के इर्द-गिर्द घूमती है. ऐसे में अब रालोद ने इस लड़ाई को जाट के अपमान से जोड़कर सपा की मुश्किलें बढ़ा दी है.
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