Vijaya Ekadashi 2026: विधवा स्त्रियों का श्रृंगार क्यों रोका गया? धर्म नहीं, समाज ने बनाई अमानवीय परंपरा

Vijaya Ekadashi 2026: नई दिल्ली। भारतीय समाज में सदियों से विधवा स्त्रियों को लेकर एक कठोर और अमानवीय सोच थोपी जाती रही है। आम धारणा बना दी गई कि विधवा महिला को सफेद कपड़े पहनने चाहिए, गहने नहीं पहनने चाहिए, सौंदर्य प्रसाधनों से दूर रहना चाहिए और हंसना-मुस्कुराना तक छोड़ देना चाहिए, मानो पति के निधन के साथ ही उसका जीवन भी समाप्त हो गया हो।लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये नियम आए कहां से? क्या सचमुच धर्म-ग्रंथ विधवा स्त्री को श्रृंगार से वंचित करने की बात करते हैं?

धर्मग्रंथों में नहीं है ऐसा कोई आदेश
प्रसिद्ध कथावाचक शिवम साधक महाराज का स्पष्ट कहना है कि किसी भी वेद, पुराण या शास्त्र में यह कहीं नहीं लिखा कि विधवा स्त्री को श्रृंगार नहीं करना चाहिए।उनके अनुसार, यह परंपरा धर्म की देन नहीं बल्कि समाज द्वारा थोपी गई एक क्रूर सोच है, जिसे समय के साथ “धार्मिक नियम” का रूप दे दिया गया।
श्रृंगार और सुहाग में फर्क समझना जरूरी
महाराज के मुताबिक, समाज की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह श्रृंगार और सुहाग को एक ही मान लेता है, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है।सुहाग के प्रतीक जैसे मांग में सिंदूर, मंगलसूत्र, बिछुए, सुहाग की चूड़ियां ये विवाह और पति की उपस्थिति के चिन्ह होते हैं। पति के निधन के बाद इन प्रतीकों को न पहनना परंपरा का हिस्सा हो सकता है।लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि स्त्री अच्छे कपड़े न पहने गहने न पहने खुद को सुंदर न बनाए चप्पल, जूते, साड़ी या सजावटी वस्त्र त्याग दे यह सब श्रृंगार के अंतर्गत आता है, और धर्म में इसे कहीं भी निषिद्ध नहीं बताया गया है।
दुख का मतलब खुद को मिटा देना नहीं
शिवम साधक महाराज कहते हैं कि धर्म कभी यह नहीं सिखाता कि दुख झेलने का तरीका खुद को कुरूप बनाना है। स्त्री का जीवन, उसकी गरिमा और उसकी खुशियां किसी एक रिश्ते पर समाप्त नहीं हो जातीं।विधवा स्त्रियों से श्रृंगार छीनने की परंपरा धार्मिक नहीं, सामाजिक विकृति है। समय आ गया है कि समाज धर्म और परंपरा के बीच फर्क समझे और स्त्रियों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दे।क्योंकि धर्म जीवन को बांधता नहीं, बल्कि उसे गरिमा देता है।
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