Lyrid Meteor Shower: 22 ब 23 अप्रैल 2026 की दरमियानी रात्रि में होगा लिरिडस उल्का वृष्टि का शानदार दीदार

✍️Amisha Sachan
22 ब 23 अप्रैल 2026 की दरमियानी रात्रि में होगा लिरिडस उल्का वृष्टि का शानदार दीदार।

Lyrid Meteor Shower: GORAKHPUR- खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल विज्ञान की सबसे लोकप्रिय घटनाओं में से एक, लिरिडस उल्का वर्षा, एक बार फिर रात्रि के आकाश में दिखाई देने जा रही है। निस्संदेह यह रात में देर तक जागने वालों और सुबह जल्दी उठने वालों दोनों के लिए आनंददायक होगीइस उल्का वर्षा का उद्गम बिंदु चमकीले तारे वेगा और तारामंडल लायरा के निकट स्थित है। यह शानदार उल्का वर्षा हर साल अप्रैल में घटित होती है।

‘लिरिड्स उल्का’ को क्या खास बनाता है और क्या है इसका ऐतिहासिक महत्व?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि प्राचीन खगोलीय जानकारियों के अनुसार 2,700 से अधिक वर्षों से, लोग लिरिड्स उल्कापिंडों से मोहित रहे हैं। इतिहास में लिरिडस उल्का वर्षा की बात करें तो हम पाते हैं कि लिरिडस उल्का वर्षा ज्ञात उल्का वर्षाओं में सबसे पुरानी होने का गौरव रखती है। इस वर्षा के अभिलेख लगभग 2,700 वर्ष पुराने हैं। वास्तव में, ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन चीनी लोगों ने 687 ईसा पूर्व में लिरिडस उल्काओं को बारिश की तरह गिरते हुए देखा था । प्राचीन चीन में वह समय, संयोगवश, वसंत और शरद ऋतु काल (लगभग 771 से 476 ईसा पूर्व) के साथ मेल खाता है, जिसे चीनी परंपरा के शिक्षक और दार्शनिक कन्फ्यूशियस से जोड़ती है,जो इस सिद्धांत को अपनाने वाले पहले लोगों में से एक थे। साथ ही इन लिरिडस उल्काओं में आकर्षण और कभी-कभी आश्चर्यजनक दृश्य देखने को मिलते हैं, लेकिन ये पर्सिड्स या जेमिनिड्स जितने तीव्र नहीं होते। ये उल्कापिंड थैचर धूमकेतु द्वारा छोड़े गए मलबे के कण हैं, जो लगभग हर 415 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है। अपने पथ पर चलते हुए यह पृथ्वी की कक्षा के भीतर आता है फ़िर बहुत ही दूर चला जाता है,लगभग 110 खगोलीय इकाई (A U) की दूरी पर जोकि सूर्य से हमारी पृथ्वी की दूरी से 110 गुना अधिक है, धूमकेतु थैचर वर्ष 2278 में वापस तो आयेगा लेकिन अफ़सोस,कि आज के मौजूदा लोग इस धूमकेतु को कभी भी नहीं देख पाएंगे, लेकिन इसका मलवा जिसे लिरिडस उल्का वर्षा के रूप में जाना जाता है, हर साल अप्रैल में दिखाई देता है इसको उल्काओं के रूप में अवश्य देख सकते हैं, जब पृथ्वी के धूल भरे मार्ग से गुजरते समय इन छोटे-छोटे टुकड़ों के हमारे वायुमंडल से होकर गुजरने के कारण ये चमकदार विस्फोट होते हैं जिन्हें हम टूटते तारे कहते हैं। लिरिडस उल्का वृष्टि जो इस धूमकेतु से उत्पन्न होती है प्रत्येक 60 वर्षों में अप्रत्याशित रूप बड़ी संख्या में उल्काओं का विस्फोट करती हुई प्रतीत होती है और अगला लिरिडस उल्काओं का विस्फोट 2042 में होने की प्रबल संभावना है ।

कब से कब तक रहेगा चरम समय?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैसे तो लिरिडस उल्का वृष्टि हर वर्ष अप्रैल में देखा जाता है लेकिन इस बार इसकी सक्रियता की अवधि 14 अप्रैल 2026 से 30 अप्रैल 2026 तक रहेगी लेकिन इसकी अधिकतम सक्रियता/ चरम बिंदु भारत में 22 अप्रैल 2026 की रात से 23 अप्रैल 2026 की भोर तक रहेगी। इसके बाद इनकी दिखाई देने की संख्या कम होती चली जायेंगी इसलिए यह समय अति महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दौरान उल्काओं की संख्या सबसे अधिक होती है।

किस दिशा में देखें और कैसे पहचानें?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उत्तरी गोलार्ध से लाइरा तारामंडल में स्थित चमकीला तारा, वेगा है जो लिरिडस उल्का वर्षा के उत्थापन बिंदु के निकट है यह अप्रैल में आपके स्थानीय समयानुसार लगभग रात 9:30 PM से 10 PM बजे के बीच उत्तर-पूर्व दिशा में आपके स्थानीय क्षितिज के ऊपर उदय होता है। वेगा पूरी रात ऊपर की ओर चढ़ता जाता है। आधी रात तक, वेगा आकाश में इतना ऊपर पहुंच जाता है कि उस दिशा से निकलने वाली उल्काएं आपके आकाश में लकीरें बनाती हुई दिखाई देती हैं। भोर से ठीक पहले, वेगा और उत्थापन बिंदु सिर के ऊपर बहुत ऊँचाई पर चमकते हैं, और उत्तरी गोलार्ध के आकाश के शीर्ष से उल्काएं बौछार करती हुई दिखाई देती हैं। और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस उल्का वृष्टि का नाम भी (Lyra) लायरा (वीणा तारामंडल) के नाम पर ही पड़ा है जिसके कारण ही इस उल्का वृष्टि को लिरिडस मीटियर शॉवर कहा जाता है क्योंकि यह उल्का वृष्टि (Lyra) लायरा (वीणा तारामंडल) से आती हुई प्रतीत होती हैं जिसको इसका ( रेडियंट पॉइंट) विकीर्णक बिंदु कहा जाता है, खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि “Lyra” लायरा ग्रीक शब्द “Lyre” (वीणा) से आया है, इसलिए इसका अर्थ वीणा या तार वाला वाद्य यंत्र भी होता है, क्योंकि देखने पर यह आकाश में वीणा जैसा कल्पित आकार में नज़र आता है। और लायरा (Lyra) या ( वीणा) तारामंडल में सबसे चमकीला तारा वेगा ( Vega) है, यह लिरिडस उल्का वृष्टि वहीं से आती हुई प्रतीत होंगी।

किस दिशा में देखें?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आपको इस शानदार खगोलीय नज़ारे को देखने के लिए, आकाश की पूर्वोत्तर दिशा की ओर देखना होगा, लेकिन वैसे तो पूरे आकाश में कहीं से भी आती हुईं दिखाईं दे सकती हैं। जिनमें दुर्लभ लेकिन रोमांचक “फायरबॉल” भी शामिल हैं, जो बेहद चमकदार उल्काएं होती हैं और अपने पीछे चमकती लकीरें छोड़ जाती हैं। इस अद्भुत नजारे को देखकर आप अचंभित हो सकते हैं इसलिए अपनी सीट बेल्ट टाइट करके बांध लीजिए क्योंकि हम आपको लेकर चलते हैं इस शानदार खगोलीय नज़ारे को देखने के लिए ब्रह्मांड की खगोलीय सैर पर।

कितने बजे से कितने बजे तक दिखाई देंगी यह उल्का वृष्टि?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आप 22 अप्रैल 2026 की रात लगभग 10 बजे के बाद से देखना शुरू कर सकते हैं लेकिन इसमें भी सबसे अच्छा समय रात लगभग 3 बजे से लेकर भोर तक रहेगा। इस उल्का वृष्टि को भारत सहित उत्तरी गोलार्ध में सबसे ज्यादा स्पष्ट तौर से देखा जा सकेगा।खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि औसतन प्रति घंटे लगभग 10 से 20 उल्काएँ दिखाई दे सकती हैं लेकिन कभी-कभी दुर्लभ प्रस्फोटन परिस्थितियों में 50–100 प्रति घंटा भी रिकॉर्ड हुए हैं जोकि पूर्णतः प्रकाश प्रदूषण रहित क्षेत्रों में ही घटित होता है, लेकिन आजकल शहरों में ज़्यादा प्रकाश प्रदूषण होने के कारण लिरिडस उल्का वृष्टि की वास्तविक दृश्य संख्या बहुत ही कम दिखती है जोकि शहरों से लगभग 5–10 प्रति घंटा तक ही सिमट जाती है। लेकिन इस बार अप्रैल 2026 में चंद्रमा का प्रभाव उल्का वृष्टि के चरम के आसपास चंद्रमा की कला कम रहेगी जिसे खगोलविज्ञान की भाषा में अर्धचंद्र अवस्था / प्रारंभिक चरण कहा जाता है। रहेगी तो इस दौरान कुछ जगहों पर यह उल्काओं की दिखने की संख्या कुछ बढ़ भी सकती है। या कुछ यूं कहें कि इसका सीधा सा मतलब हुआ कि आकाश में अपेक्षाकृत कुछ अंधेरा रहेगा इस दौरान देखने की दशा कुछ अच्छी होगी।

कैसे देखें लिरिडस उल्काओं की बर्षा?।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस लिरिडस उल्का वृष्टि को देखने के लिए किसी भी प्रकार के टेलिस्कोप एवम् विनोकुलर की कोई भी जरूरत नहीं है, आप अपनी साधारण नंगी आंखों से ही भरपूर लुत्फ़ उठा सकते हैं। लेकिन मोबाइल फोन की स्क्रीन एवं बाह्य प्रकाश प्रदूषण आदि की रोशनी से दूर,धैर्य पूर्वक 20–30 मिनट अपनी आंखों को अंधेरे में समायोजित होने दें और शहर की रोशनी से दूर जाएं जहां प्रकाश प्रदूषण बहुत ही कम हो या फ़िर आप किसी दूर ग्रामीण या पहाड़ी इलाकों का चुनाव करें जहां से आसमान खुला और साफ़ दिखे और पूर्ण सावधानी के साथ ही किसी साफ़ स्वच्छ एवं अंधेरी बाली जगहों पर जैसे किसी छत या खुले मैदान में भी जाकर इस उल्का बौछार का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।

उल्का वर्षा क्यों होती है ?।

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस लिरिडस उल्का वृष्टि ( Lyrid meteor shower) का स्रोत धूमकेतु C/1861 G1 Thatcher (सी /1861जी1 थैचर) है। जैसा कि अवगत हों कि न्यूयॉर्क शहर के अल्फ्रेड ई. थैचर ने 5 अप्रैल 1861 को इस धूमकेतु को खोजा था जिसे ही अब आधिकारिक रूप से सी/1861जी 1( थैचर) के नाम से जाना जाता है। वैसे ज़्यादातर कोई भी उल्का वृष्टि होने का कारण कोई न कोई धूमकेतु ही होता है,जैसे कि जब पृथ्वी, किसी धूमकेतु द्वारा छोड़े गए मलबे की कक्षा से गुजरती है, तो छोटे-छोटे कण, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वायुमंडल में दाख़िल होकर वायुमंडलीय घर्षण के कारण छड़ भर के लिए आकाश में जलते/ उद्दीप्त हो उठते हैं उन्हें ही खगोल विज्ञान की भाषा में उल्का वृष्टि कहा जाता है लेकिन इन्हें ही अक्सर सामान्य आम बोलचाल की भाषा में “shooting stars” शुटिंग स्टार्स या टूटते हुए तारों की संज्ञा भी दी जाती है। वास्तविक रूप में यह कोई तारे नहीं होते हैं बल्कि यही होती हैं उल्काएं, लेकिन इनका भी अपना स्वयं का एक चरम दृश्य एवं चरम अवधि या सर्वाधिक सक्रिय समय-खिड़की होती है जिस दौरान उल्काएं सबसे अधिक तीव्र या अधिकतम स्तर पर होती हैं , इस बार लिरिडस उल्का बौछार के लिए यह चरम खिड़की 22 अप्रैल 2026 की मध्य रात्रि से लेकर 23 अप्रैल 2026 की भोर लगभग 3 बजे के आसपास सबसे ज्यादा सक्रिय होगी।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उल्का वर्षा प्रकृति की अपनी ही आतिशबाजी है। हजारों उल्काओं से बनी ये वर्षाएँ देखने में बेहद खूबसूरत होती हैं ,उल्का वर्षा देखना धैर्य का खेल है। अगर आप पर्याप्त समय तक प्रतीक्षा करेंगे, तो आपको एक शानदार नजारा देखने को ज़रूर मिलेगा हालांकि उल्का वर्षा की दृश्यता कई कारकों पर निर्भर करती है, जिनमें कई चीजें शामिल हैं जैसे स्थानीय मौसम, चरम समय, प्रकाश बिंदु की स्थिति और आकाश में वह बिंदु जहाँ से उल्का वर्षा उत्पन्न होती प्रतीत होती है, चंद्रमा के उदय और सूर्यास्त का समय, और चंद्रमा की कला आदि,इसीलिए आपको बस समय, धैर्य और शहर की रोशनी से दूर एक शांत जगह चाहिए और अपनी यात्रा की योजना इस प्रकार बनाएं कि मौसम के अनुसार कपड़े पहनें क्योंकि उल्काओं को देखना,तारों को निहारने की तरह ही, एक प्रतीक्षा का खेल हो सकता है, इसलिए ऐसी कुछ चीजें साथ ले जाएं जो आपकी प्रतीक्षा को आरामदायक बना सके, जैसे पेय पदार्थ, कंबल,आरामदेह कुर्सियां, तकिए और गद्दे आदि जिन पर पीठ के बल लेट कर आराम से आकाश के आकर्षक खगोलीय नज़ारे देखे जा सकें फ़िर इस एस्ट्रो टूर के शो का भरपूर आनंद लें। यही होगा आपका भी एस्ट्रो टूरिज्म। या खगोलीय पर्यटन।

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