सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के मासिक धर्म अवकाश की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

✍️Amisha Sachan
सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के मासिक धर्म अवकाश की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से शुक्रवार को इनकार कर दिया। यह याचिका शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई थी।याचिका सीजेआई एन.वी. सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने रखी गई। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि इस तरह की याचिकाएँ कभी-कभी महिलाओं को कमजोर या कमतर दिखाने का माहौल बना देती हैं। उनका मानना है कि इससे यह डर पैदा होता है कि मासिक धर्म महिलाओं के साथ कुछ बुरा होने जैसा है, जिससे उनके हितों को नुकसान हो सकता है।

नियोक्ताओं और करियर पर प्रभाव

सीजेआई सूर्यकांत ने यह भी कहा कि यदि मासिक अवकाश को अनिवार्य कर दिया गया तो नियोक्ता महिलाओं को जिम्मेदार पदों पर काम देने में हिचक सकते हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि न्यायिक सेवाओं में भी महिलाएँ सामान्य ट्रायल जैसे महत्वपूर्ण कार्यों से बचाई जा सकती हैं, जिससे उनके करियर पर असर पड़ सकता है। उन्होंने प्रश्न किया, “क्या नियोक्ता इससे खुश होंगे?”जस्टिस जॉयमलया बागची ने भी याचिका की व्यावहारिक और आर्थिक दृष्टि पर टिप्पणी करते हुए कहा कि व्यापारिक मॉडल और प्रबंधन को देखते हुए नियोक्ताओं को इसका प्रभाव समझना जरूरी है।

राज्यों में प्रावधान और याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि केरल, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों में कुछ संस्थानों में मासिक धर्म अवकाश या रियायतें दी जाती हैं। उनका तर्क था कि इस प्रावधान को पूरे देश में लागू किया जा सकता है।याचिकाकर्ता ने कहा कि गर्भावस्था के लिए अवकाश मिलता है, लेकिन मासिक धर्म के लिए नहीं। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि सभी राज्यों को ऐसे नियम बनाने का निर्देश दिया जाए, ताकि कामकाजी महिलाओं और छात्राओं को मासिक धर्म से जुड़ी तकलीफों के दौरान आराम और सुरक्षा मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट का नीतिगत दृष्टिकोण

हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला नीतिगत फैसला है और इस पर निर्णय लेना सरकार का काम है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को इस विषय में सीधे सरकार के पास जाना चाहिए। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।पीठ का यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि मासिक अवकाश जैसी नीतिगत पहलें कानून या न्यायालय के निर्देश से अधिक सरकारी नीति पर निर्भर करती हैं।

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