मेरठ : परशुराम जयंती जुलूस में हथियारों पर DSP की सख्ती, वीडियो वायरल के बाद विवाद बढ़ा

उत्तर प्रदेश के मेरठ में परशुराम जयंती के अवसर पर निकाले गए जुलूस के दौरान एक ऐसा मामला सामने आया जिसने सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर तक चर्चा को जन्म दे दिया है। जुलूस में कुछ लोगों द्वारा फरसा और डंडा लेकर चलने पर पुलिस प्रशासन ने सख्ती दिखाई, जिसके बाद स्थिति को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया।

घटना के दौरान मौके पर मौजूद महिला डिप्टी एसपी शुचिता सिंह ने स्वयं माइक संभालकर भीड़ को संबोधित किया और स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि जुलूस में हथियार जैसे दिखने वाले सामान लेकर चलना नियमों के खिलाफ है और ऐसे लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।वायरल वीडियो में डिप्टी एसपी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि जो लोग फरसा और डंडा लेकर चल रहे हैं, उनकी फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग की जा रही है और सभी पर मुकदमा दर्ज किया जाएगा। उन्होंने आयोजकों को भी निर्देश दिया कि तुरंत ऐसे सभी प्रतीकात्मक हथियारों को जुलूस से अलग कराया जाए।
डिप्टी एसपी की इस सख्ती के बाद मौके पर कुछ देर के लिए तनावपूर्ण स्थिति भी बनी रही, हालांकि पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखा। प्रशासन का कहना है कि किसी भी धार्मिक या सामाजिक जुलूस में कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता है और सार्वजनिक सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।इस घटना के बाद वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो सामने आने के बाद अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक वर्ग इसे कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम बता रहा है, जबकि कुछ लोग इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर नाराजगी भी जता रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर ब्राह्मण समाज के कुछ लोगों द्वारा इस बयान को लेकर आपत्ति जताने की खबरें भी सामने आई हैं। उनका कहना है कि यह परंपरा से जुड़ा आयोजन था और इसे लेकर पुलिस की सख्ती अनुचित है। वहीं प्रशासन का पक्ष है कि कानून सभी के लिए समान है और किसी भी जुलूस में वास्तविक या प्रतीकात्मक हथियारों का प्रदर्शन सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है।पुलिस अधिकारियों ने साफ किया है कि किसी भी समुदाय या परंपरा को निशाना बनाने का उद्देश्य नहीं है, बल्कि केवल कानून-व्यवस्था और भीड़ नियंत्रण सुनिश्चित करना प्राथमिकता है। मेरठ पुलिस मामले की वीडियो फुटेज की जांच कर रही है और आयोजकों से भी बातचीत की जा रही है।इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजनों में पहले से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होने चाहिए ताकि किसी तरह की गलतफहमी या विवाद की स्थिति न बने।
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