बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। ताजा मामला 8 जनवरी का है, जब सुनामगंज जिले में एक हिंदू युवक की संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या कर दी गई। मृतक की पहचान जॉय महापात्रो के रूप में हुई है। इस घटना ने एक बार फिर बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।परिजनों के अनुसार, जॉय महापात्रो को पहले बेरहमी से पीटा गया और उसके बाद स्थानीय निवासी अमीरुल इस्लाम ने उसे जबरन जहर पिला दिया। गंभीर हालत में जॉय को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है और हिंदू समुदाय में डर और आक्रोश व्याप्त है।

पहले मारपीट, फिर जहर देने का आरोप
परिवार का कहना है कि जॉय को किसी विवाद के बहाने बुलाया गया था, जहां उसके साथ मारपीट की गई। इसके बाद उसे जहरीला पदार्थ दिया गया। हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके। परिजनों ने इस घटना को सुनियोजित हत्या करार दिया है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इलाके में इससे पहले भी हिंदू समुदाय को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती।
अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले
बांग्लादेश में बीते कुछ समय से हिंदू, बौद्ध और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हमलों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कभी मंदिरों में तोड़फोड़, तो कभी व्यक्तिगत स्तर पर हिंसा की घटनाएं दर्ज की जा रही हैं। जॉय महापात्रो की हत्या को इसी सिलसिले की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
भारत की कड़ी प्रतिक्रिया
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर गहरी चिंता जताई है। मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि इस तरह की घटनाएं न सिर्फ मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी खतरा पैदा करती हैं।विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश सरकार से मांग की है कि दोषियों के खिलाफ तत्काल और सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि अल्पसंख्यक समुदायों में सुरक्षा का भरोसा बहाल हो सके।
जांच पर उठ रहे सवाल
हालांकि स्थानीय प्रशासन ने मामले की जांच शुरू करने की बात कही है, लेकिन परिजनों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि जब तक निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई नहीं होती, तब तक ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं।जॉय महापात्रो की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यक खुद को सुरक्षित महसूस कर पा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि बांग्लादेश सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है।
